महाशिवरात्रि व्रत कथा | शिव पार्वती विवाह और पूजा विधि
🙏 महाशिवरात्रि व्रत कथा 🙏 **महाशिवरात्रि का महत्व:** महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का सर्वाधिक पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह व्रत फाल...
पढ़ें →धर्मराज की यह पवित्र कथा हमें जीवन में नैतिकता, सत्य और धर्म के महत्व को समझाती है। भगवान यमराज, जिन्हें धर्मराज भी कहा जाता है, जीवों के कर्मों का न्याय करते हैं। उनकी कथा सुनने से मनुष्य के भीतर सत्कर्मों के प्रति श्रद्धा जाग्रत होती है और पापों का भय समाप्त होता है। यह कथा बताती है कि कैसे एक धार्मिक जीवन जीने से मृत्यु के पश्चात सद्गति प्राप्त होती है।
बहुत समय पहले एक बुढ़िया माई रहती थी। वह नित्य व्रत-उपवास करती और नियमों का पालन करती थी। एक दिन यमदूत उसे लेने आ गए। बुढ़िया माई यमदूत के साथ परलोक की यात्रा पर निकल पड़ी। रास्ते में एक विशाल नदी बह रही थी। बुढ़िया जल में डूबने लगी।
तभी यमदूत ने प्रश्न किया - "बुढ़िया, क्या तूने गौमाता का दान किया था?" बुढ़िया ने मन ही मन गौमाता को स्मरण किया। तुरंत गौमाता प्रकट हुईं। बुढ़िया ने गौमाता की पूंछ पकड़कर नदी पार कर ली।
आगे बढ़ने पर भयंकर काले कुत्ते उस पर झपटे। यमदूत ने पूछा - "क्या तूने कभी कुत्ते को रोटी खिलाई थी?" बुढ़िया ने कुत्ते का ध्यान किया तो कुत्ते वहां से चले गए। कुछ दूर आगे जाने पर काले कौवे उसे चोंच मारने लगे। यमदूत बोले - "क्या तूने कभी ब्राह्मण पुत्री को सिर में लगाने के लिए तेल दिया था?" बुढ़िया ने ब्राह्मण पुत्री को याद किया तो कौवे उड़ गए।
फिर मार्ग में काटों से पैर घायल होने लगे। यमदूत ने कहा - "क्या तूने कभी चप्पल का दान किया था?" बुढ़िया ने स्मरण किया तो उसके पैरों में जूते आ गए। जब चित्रगुप्त के दरबार में पहुंची तो चित्रगुप्त जी ने यमदूतों से पूछा - "तुम किसे ले आए हो?"
यमदूतों ने बताया - "यह बुढ़िया अनेक दान-पुण्य कर चुकी है, लेकिन धर्मराज जी की कथा कभी नहीं सुनी। अतः आगे के द्वार बंद हैं।" यह सुनकर बुढ़िया ने प्रार्थना की - "मुझे सात दिन के लिए धरती पर वापस जाने दीजिए। मैं धर्मराज जी की कथा सुनकर उद्यापन करूंगी, फिर लौट आऊंगी।"
धर्मराज जी ने उसके प्राण लौटा दिए। धरती पर बुढ़िया के शरीर में पुनः जान आ गई। लोग उसे जीवित देखकर चिल्लाने लगे - "भूतनी आ गई!" बुढ़िया अपने घर पहुंची और बेटे-बहू को समझाया - "मैं भूतनी नहीं, धर्मराज जी की आज्ञा से लौटी हूं। मैं सात दिन तक धर्मराज की कथा सुनकर उद्यापन करूंगी।"
बेटे-बहू ने पूजा की सामग्री तो दी पर कथा सुनते समय हुंकार नहीं भरी। तब बुढ़िया अपनी पड़ोसन के पास गई। पड़ोसन ने बड़ी श्रद्धा से कथा सुनी और हुंकार भरी। सातवें दिन उद्यापन के बाद धर्मराज जी ने स्वर्ग से दिव्य विमान भेजा।
विमान को देखकर पूरे गांव के लोग बुढ़िया से स्वर्ग ले जाने की विनती करने लगे। बुढ़िया बोली - "मेरी कथा तो सिर्फ पड़ोसन ने सुनी थी।" यह सुनते ही सभी ग्रामवासियों ने बुढ़िया के चरण पकड़ लिए और कथा सुनाने की याचना की। बुढ़िया ने सबको कथा सुनाई। सभी विमान में बैठकर स्वर्ग चले गए।
स्वर्ग में सबको देखकर धर्मराज जी बोले - "मैंने तो सिर्फ बुढ़िया के लिए विमान भेजा था!" बुढ़िया ने कहा - "हे प्रभु, इन सबने मेरी कथा सुनी है। कृपया मेरे पुण्य का आधा भाग इन्हें दे दीजिए और स्वर्ग में निवास दीजिए।" धर्मराज जी ने सभी को स्वर्ग में वास दे दिया।
इसलिए हे धर्मराज जी! जिस प्रकार बुढ़िया माई और सभी ग्रामवासियों को स्वर्ग दिया, वैसे ही कथा कहने वाले, सुनने वाले और हुंकार भरने वाले सभी को स्वर्ग प्रदान करें।