महाशिवरात्रि व्रत कथा | शिव पार्वती विवाह और पूजा विधि
🙏 महाशिवरात्रि व्रत कथा 🙏 **महाशिवरात्रि का महत्व:** महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का सर्वाधिक पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह व्रत फाल...
पढ़ें →प्रदोष व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत त्रयोदशी तिथि को किया जाता है और प्रदोष काल में भगवान शंकर की पूजा की जाती है। प्रदोष का अर्थ है सूर्यास्त के बाद और रात्रि से पूर्व का समय। इस समय भगवान शिव की आराधना करने से विशेष फल प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत सात दिनों में किया जा सकता है - रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार। प्रत्येक दिन के प्रदोष व्रत का अपना विशेष महत्व और फल है। जो भी व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति से इस व्रत को करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।
🙏 प्रदोष व्रत का परिचय 🙏
**प्रदोष का अर्थ:**
'प्रदोष' शब्द का अर्थ है सूर्यास्त के उपरांत और रात्रि प्रारंभ होने से पूर्व का समय। शास्त्रों में कहा गया है कि यह समय भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत उत्तम है। इसी काल में भगवान शंकर का पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
**व्रत की विधि:**
त्रयोदशी तिथि के दिन व्रती को संपूर्ण दिन निराहार रहना चाहिए। सायंकाल जब सूर्यास्त में तीन घड़ी का समय शेष हो, तब स्नान आदि से निवृत्त होकर श्वेत वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात संध्यावंदन करने के उपरांत शिवजी की पूजा आरंभ करें।
पूजा स्थल को स्वच्छ जल से धोकर वहां मंडप बनाएं। पांच रंगों के पुष्पों से कमल की आकृति बनाकर कुश का आसन बिछाएं। आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। इसके पश्चात भगवान महादेव का ध्यान करें।
**ध्यान स्वरूप:**
करोड़ों चंद्रमाओं के समान कांतियुक्त, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्र धारण करने वाले, पिंगल वर्ण की जटाएं धारण किए हुए, नीलकंठ, अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरद हस्त, त्रिशूलधारी, सर्पों के कुंडल पहने हुए, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए।
**उद्यापन की विधि:**
प्रातःकाल स्नान आदि कार्यों से निवृत्त होकर रंगीन वस्त्रों से मंडप सजाएं। फिर उस मंडप में शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करके विधिपूर्वक पूजन करें। तदुपरांत शिव-पार्वती के निमित्त खीर से अग्नि में हवन करना चाहिए।
हवन के समय 'ॐ उमा सहित शिवाय नमः' मंत्र से १०८ बार आहुति दें। इसी प्रकार 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र के उच्चारण से भगवान शंकर के निमित्त आहुति प्रदान करें। हवन समाप्ति पर किसी धार्मिक व्यक्ति को सामर्थ्य अनुसार दान दें।
तदुपरांत ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा से संतुष्ट करें। व्रत पूर्ण हुआ, ऐसा वाक्य ब्राह्मणों से कहलवाएं। ब्राह्मणों की अनुमति प्राप्त कर अपने परिजनों के साथ भगवान शंकर का स्मरण करते हुए भोजन ग्रहण करें।
इस प्रकार उद्यापन करने से व्रती को पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति होती है तथा आरोग्य लाभ होता है। इसके अतिरिक्त शत्रुओं पर विजय मिलती है एवं समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। यह स्कंद पुराण में वर्णित है।
**त्रयोदशी व्रत का महत्व:**
त्रयोदशी अर्थात प्रदोष व्रत करने वाला मनुष्य सदैव सुखी रहता है। इस व्रत के प्रभाव से समस्त पापों का नाश हो जाता है। इस व्रत को करने से विधवा स्त्रियों को अधर्म से विरक्ति होती है और सुहागिन स्त्रियों का सुहाग सदा अटल रहता है। बंदी को कारागार से मुक्ति मिलती है।
जो स्त्री-पुरुष जिस कामना से यह व्रत करते हैं, उनकी समस्त कामनाएं कैलाशपति भगवान शंकर पूर्ण करते हैं। सूत जी कहते हैं कि त्रयोदशी व्रत करने वाले को सौ गायों के दान का फल प्राप्त होता है।
इस व्रत को जो विधि-विधान और तन-मन-धन से करता है, उसके समस्त दुख दूर हो जाते हैं। सभी स्त्रियों को ग्यारह त्रयोदशी या संपूर्ण वर्ष की २६ त्रयोदशी पूर्ण करने के उपरांत उद्यापन करना चाहिए।
**प्रदोष व्रत में वार का महत्व:**
त्रयोदशी तिथि पर जो भी वार पड़ता है, उसी दिन के अनुसार व्रत करना चाहिए तथा उसी दिन की कथा पढ़नी या सुननी चाहिए। विशेष रूप से रवि, सोम और शनि प्रदोष व्रत अवश्य करने चाहिए। इन सभी से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।
**विभिन्न वारों के प्रदोष व्रत:**
१. **रविवार प्रदोष व्रत** - दीर्घायु और आरोग्यता प्राप्ति के लिए रवि प्रदोष व्रत करना चाहिए।
२. **सोमवार प्रदोष व्रत** - ग्रह दशा निवारण की कामना हेतु सोम प्रदोष व्रत करें।
३. **मंगलवार प्रदोष व्रत** - रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य प्राप्ति हेतु मंगल प्रदोष व्रत करें।
४. **बुधवार प्रदोष व्रत** - सर्व कामना सिद्धि के लिए बुध प्रदोष व्रत करें।
५. **बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत** - शत्रु विनाश के लिए गुरु प्रदोष व्रत करें।
६. **शुक्रवार प्रदोष व्रत** - सौभाग्य और स्त्री समृद्धि के लिए शुक्र प्रदोष व्रत करें।
७. **शनिवार प्रदोष व्रत** - खोया हुआ राज्य एवं पद प्राप्ति की कामना हेतु शनि प्रदोष व्रत करें।
**व्रत का फल:**
प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
• सभी पापों से मुक्ति
• धन-संपत्ति की प्राप्ति
• संतान सुख
• आरोग्य लाभ
• शत्रुओं पर विजय
• मनोकामना पूर्ति
• कारागार से मुक्ति
• सुहाग की स्थिरता
• राज्य और पद की प्राप्ति
**महत्वपूर्ण निर्देश:**
- व्रत के दिन निराहार रहें
- प्रदोष काल में पूजा करें
- श्वेत वस्त्र धारण करें
- बेल पत्र अवश्य चढ़ाएं
- ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें
- ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा दें
- कथा का श्रवण अवश्य करें
🙏 ॐ नमः शिवाय 🙏