महाशिवरात्रि व्रत कथा | शिव पार्वती विवाह और पूजा विधि
🙏 महाशिवरात्रि व्रत कथा 🙏 **महाशिवरात्रि का महत्व:** महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का सर्वाधिक पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह व्रत फाल...
पढ़ें →बृहस्पतिवार का यह पवित्र व्रत हर गुरुवार को किया जाता है और भगवान विष्णु की विशेष आराधना होती है। इस कथा में एक उदार राजा और उनकी पत्नी की कहानी है जो दर्शाती है कि दान-पुण्य का अपमान करने से किस प्रकार सभी सुख नष्ट हो जाते हैं। जब रानी ने गुरु बृहस्पति के व्रत को अपनाया, तो उनके जीवन में पुनः खुशहाली आई। जो लोग विधि-विधान से इस व्रत को रखते हैं, उन्हें गुरु बृहस्पति देव की असीम कृपा से धन, संतान और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
🙏 गुरुवार व्रत कथा 🙏
**प्रारंभ:**
बहुत समय पहले की बात है। भारत देश में एक महान और उदार हृदय वाले राजा का शासन था। वह अत्यंत दानी और परोपकारी थे। प्रतिदिन प्रातःकाल मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। ब्राह्मण और गुरुजनों का सम्मान करना और उनकी सेवा करना उनका धर्म था। उनके दरवाजे से कोई भी व्यक्ति निराश होकर वापस नहीं लौटता था। हर गुरुवार को वे व्रत रखते और विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते थे। निर्धनों और जरूरतमंदों की मदद करना उनका स्वभाव था।
किंतु उनकी महारानी का स्वभाव बिल्कुल विपरीत था। वह न तो कभी व्रत रखती थीं और न ही किसी को दान देती थीं। राजा को भी इस तरह का दान-धर्म करने से रोकने का प्रयास करती रहती थीं।
एक दिन की बात है, राजा शिकार के लिए जंगल की ओर प्रस्थान कर गए। राजमहल में रानी और उनकी सेविकाएं थीं। उसी समय गुरु बृहस्पतिदेव ने एक साधारण साधु का रूप धारण किया और राजमहल के द्वार पर भिक्षा मांगने पहुंचे।
साधु ने रानी से भिक्षा की याचना की। रानी बोली - "हे साधु जी! मैं इन सब दान-पुण्य के कामों से तंग आ चुकी हूं। इसके लिए तो मेरे पति ही पर्याप्त हैं। आप कृपा करके ऐसा वरदान दें कि यह सारा धन-दौलत खत्म हो जाए और मैं शांति से जीवन व्यतीत कर सकूं।"
साधु रूपी गुरु बृहस्पतिदेव ने कहा - "हे देवी! तुम्हारी सोच बहुत अजीब है। धन और संतान से कोई दुखी नहीं होता, बल्कि सभी इनकी कामना करते हैं। पापी व्यक्ति भी पुत्र और धन चाहता है। यदि तुम्हारे पास अधिक संपत्ति है तो भूखे लोगों को भोजन कराओ, जल के लिए प्याऊ बनवाओ, ब्राह्मणों को दान दो, धर्मशालाएं निर्माण करवाओ, कुएं-तालाब बनवाओ, बगीचे लगवाओ, गरीब कन्याओं के विवाह में सहायता करो और यज्ञ-हवन करो। ऐसे कार्यों से तुम्हारे परिवार का नाम स्वर्ग में भी यशस्वी होगा और तुम्हें भी परलोक में सुख मिलेगा।"
परंतु रानी साधु के उपदेश से प्रभावित नहीं हुई। वह बोली - "हे साधु जी! मुझे ऐसी संपत्ति की आवश्यकता नहीं जिसे मैं लोगों में बांटती रहूं और जिसकी देखभाल में ही मेरा समय व्यर्थ हो जाए।"
साधु ने उत्तर दिया - "हे देवी! यदि तुम्हारी यही मंशा है तो मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं। गुरुवार के दिन घर और आंगन को गोबर से लीपो, अपने केशों को पीली मिट्टी से धोओ, केश धोते समय स्नान करो, राजा से कहो कि वे हजामत बनवाएं, भोजन में मांस-मदिरा का सेवन करो, वस्त्र धोबी को धुलने के लिए दो। इस प्रकार सात गुरुवार तक ऐसा करने से तुम्हारी सारी संपत्ति नष्ट हो जाएगी।"
यह कहकर साधु रूपी बृहस्पति देव गायब हो गए। रानी ने साधु द्वारा बताए गए तरीके को अपनाने का निर्णय लिया। साधु के निर्देशों के अनुसार मात्र तीन गुरुवार में ही उनकी संपूर्ण धन-दौलत समाप्त हो गई। भोजन के लिए परिवार तरसने लगा।
**राजा का परदेश जाना:**
तब राजा ने रानी से कहा - "हे रानी! तुम यहीं रहो। मैं किसी दूसरे प्रदेश में जाता हूं क्योंकि यहां सब मुझे पहचानते हैं और मैं कोई काम नहीं कर पाऊंगा। मैं परदेश जाकर कोई रोजगार करूंगा, शायद हमारी किस्मत बदल जाए।"
ऐसा कहकर राजा परदेश चले गए। वहां वे जंगल से लकड़ियां काटते और नगर में बेचकर अपना गुजारा करने लगे।
**रानी की कठिनाई:**
इधर राजा के बिना रानी और सेविकाएं कष्ट में जीवन बिताने लगीं। कभी भोजन मिलता तो कभी केवल पानी पीकर दिन गुजारना पड़ता।
एक बार ऐसा हुआ कि रानी और सेविकाओं को लगातार सात दिन भूखा रहना पड़ा। तब रानी ने अपनी दासी से कहा - "पास के नगर में मेरी बहन रहती है। वह बहुत धनी है। तू उसके पास जा और पांच सेर अनाज लेकर आ।"
दासी रानी की बहन के घर गई। उस समय रानी की बहन पूजा में व्यस्त थी क्योंकि गुरुवार का दिन था। दासी ने कई बार पुकारा लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला क्योंकि वह गुरुवार की व्रत कथा सुन रही थी।
कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर दासी निराश और क्रोधित होकर लौट आई। उसने रानी को बताया - "आपकी बहन बहुत अभिमानी है। वह सेवकों से बात भी नहीं करती।"
रानी ने उत्तर दिया - "इसमें उसका कोई दोष नहीं। विपत्ति के समय कोई साथ नहीं देता। यह हमारे कर्मों का फल है।"
**बहन का आगमन:**
उधर रानी की बहन को ख्याल आया कि मेरी बहन की दासी आई थी लेकिन मैंने उत्तर नहीं दिया, वह दुखी हुई होगी। पूजा-पाठ समाप्त करके वह अपनी बहन के महल पहुंची और बोली - "बहन! मैं गुरुवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी आई थी लेकिन व्रत कथा के समय हम नहीं बोलते। बताओ, वह क्यों आई थी?"
रानी ने जवाब दिया - "बहन! हमारे पास अनाज नहीं था। इसलिए मैंने दासी को भेजा था।"
बहन बोली - "देखो बहन! गुरु बृहस्पति भगवान सबकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। शायद तुम्हारे घर में ही अनाज रखा हो।"
दासी ने घर की जांच की तो उसे एक घड़ा अनाज से भरा हुआ मिल गया।
दासी ने रानी से कहा - "जब हमें भोजन नहीं मिलता तो हम रोज ही भूखे रहते हैं। यदि हम इस व्रत की विधि जान लें तो हम भी कर सकते हैं।"
रानी ने अपनी बहन से गुरुवार व्रत की विधि पूछी। बहन ने विस्तार से बताया - "गुरुवार को सूर्योदय से पहले उठो, स्नान करो लेकिन सिर नहीं धोना है। चने की दाल और गुड़ से भगवान विष्णु का केले के पौधे की जड़ में पूजन करो। दीपक जलाओ। दिन में एक बार ही भोजन करो और वह भी पीले रंग के खाद्य पदार्थों का। फिर कथा सुनो। इससे गुरु भगवान प्रसन्न होते हैं और अन्न, पुत्र, धन देते हैं।"
**व्रत का आरंभ:**
रानी और दासी दोनों ने निश्चय किया कि वे अवश्य गुरु बृहस्पति का व्रत करेंगी। अगले गुरुवार को उन्होंने व्रत रखा। घुड़साल से चना और गुड़ बीनकर लाईं और केले की जड़ में विष्णु भगवान की पूजा की।
भोजन की चिंता थी लेकिन क्योंकि उन्होंने व्रत रखा था, गुरु बृहस्पतिदेव प्रसन्न थे। वे एक सामान्य व्यक्ति के रूप में दो थालों में स्वादिष्ट पीला भोजन लेकर आए और बोले - "यह भोजन तुम दोनों के लिए है।"
इसके बाद से वे हर गुरुवार व्रत और पूजन करने लगीं। भगवान की कृपा से उनके पास धन आने लगा।
लेकिन रानी फिर से आलस्य करने लगी। दासी ने समझाया - "रानी! पहले भी आलस्य के कारण सब कुछ नष्ट हो गया था। अब भगवान की कृपा से धन मिला है। हमें दान-पुण्य करना चाहिए। भूखों को भोजन कराओ, प्याऊ बनवाओ, कुएं-तालाब बनवाओ, मंदिर बनवाओ। इससे यश बढ़ेगा।"
दासी की सलाह मानकर रानी ने पुण्य कार्य करने शुरू किए। उनकी ख्याति फैलने लगी।
**राजा की वापसी:**
एक दिन रानी और दासी ने सोचा कि राजा किस हाल में होंगे। उन्होंने गुरु भगवान से प्रार्थना की। भगवान ने रात में राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा - "राजन! उठो! तुम्हारी पत्नी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। अपने राज्य लौट जाओ।"
प्रातः राजा जंगल की ओर जा रहे थे, तभी उन्हें एक साधु मिले। साधु रूपी बृहस्पतिदेव ने पूछा - "हे लकड़हारे! तुम किस चिंता में हो?"
राजा की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने साधु को सब कुछ बता दिया।
साधु बोले - "राजन! तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था इसलिए यह स्थिति आई। अब चिंता मत करो। तुम्हारी पत्नी गुरुवार व्रत कर रही है। तुम भी व्रत करो। चने की दाल, गुड़ और जल से केले के पत्ते में विष्णु भगवान का पूजन करो और कथा सुनो। भगवान तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूरी करेंगे।"
राजा बोले - "मुझे तो लकड़ी बेचने से इतना भी नहीं बचता कि व्रत कर सकूं। और मुझे कौन सी कथा पता है?"
साधु ने समझाया - "राजन! गुरुवार को तुम्हें सामान्य से दोगुना धन मिलेगा। उससे पूजा करना और भोजन करना।"
फिर साधु ने राजा को गुरुवार व्रत की कथा सुनाई।
राजा ने व्रत रखना शुरू किया। उनके सभी कष्ट दूर होने लगे।
(कथा में राजा को कई परीक्षाएं देनी पड़ीं - कारागार में जाना, फिर मुक्त होना आदि)
**अंत:**
अंततः राजा अपने राज्य लौटे। वहां कुएं, धर्मशालाएं और बगीचे देखकर प्रसन्न हुए। पता चला कि ये सब रानी और दासी ने बनवाए हैं।
राजा ने रानी से मुलाकात की। दोनों ने संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना की। भगवान की कृपा से रानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।
राजा-रानी जीवनभर व्रत करते रहे और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए भगवान बृहस्पति की कृपा से मोक्ष प्राप्त किया।
**निष्कर्ष:**
जो स्त्री-पुरुष विधिवत गुरुवार का व्रत करते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, भगवान उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
🙏 जय बृहस्पति देव 🙏
॥ इति श्री गुरुवार व्रत कथा संपूर्ण ॥