महाशिवरात्रि व्रत कथा | शिव पार्वती विवाह और पूजा विधि
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पढ़ें →धर्मराज व्रत कथा का श्रवण विशेष रूप से आत्मा की शांति और मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्ति के लिए किया जाता है। यह व्रत मनुष्य को यमलोक की कठिन यातनाओं से बचने और परलोक में सुखद स्थान प्राप्त करने की विधि सिखाता है। इस कथा में दान-पुण्य और धर्मराज की भक्ति की महिमा का विस्तार से वर्णन है। श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करने से परिवार में सुख-शांति और अंत में बैकुंठ की प्राप्ति होती है।
धर्मराज व्रत कथा - मोक्ष प्राप्ति का मार्ग
एक धर्मपरायण ब्राह्मणी थी जो मृत्यु के पश्चात भगवान के लोक में पहुंची। वहां पहुंचकर उसने कहा - "मुझे धर्मराज जी के मंदिर का रास्ता बताइए।" स्वर्ग से एक दूत आया और बोला - "ब्राह्मणी, आपको क्या चाहिए?" वह बोली - "मुझे धर्मराज मंदिर का रास्ता दिखा दीजिए।"
आगे-आगे दूत और पीछे-पीछे ब्राह्मणी मंदिर तक गए। ब्राह्मणी बहुत धार्मिक महिला थी, उसने अनेक दान-पुण्य किए थे। उसे पूर्ण विश्वास था कि उसके लिए धर्मराज जी के मंदिर का द्वार अवश्य खुल जाएगा।
ब्राह्मणी ने वहां जाकर देखा - एक विशाल मंदिर, सोने का सिंहासन, हीरे-मोतियों से जड़ित छत्र। धर्मराज जी न्याय सभा में विराजमान थे, साक्षात इंद्र के समान शोभायमान। वे न्याय और नीति से अपना राज्य संभाल रहे थे। यमराज जी सबको उनके कर्मों के अनुसार दंड दे रहे थे।
ब्राह्मणी ने जाकर प्रणाम किया और निवेदन किया - "प्रभु, मुझे वैकुण्ठ जाना है।" धर्मराज जी ने चित्रगुप्त से कहा - "इनका लेखा-जोखा सुनाओ।" चित्रगुप्त ने सम्पूर्ण लेखा सुनाया।
लेखा सुनकर धर्मराज जी ने कहा - "तुमने सभी धर्म-कर्म किए हैं, परंतु धर्मराज जी की कथा नहीं सुनी। बिना कथा सुने वैकुण्ठ में कैसे जा सकती हो?"
ब्राह्मणी ने पूछा - "धर्मराज जी की कथा के क्या नियम हैं?"
धर्मराज जी बोले - "कोई एक वर्ष, कोई छह महीने, कोई केवल सात दिन ही सुने, परंतु धर्मराज जी की कथा अवश्य सुननी चाहिए। फिर उसका उद्यापन करना चाहिए।"
"उद्यापन में - खाट, छतरी, चप्पल, बाल्टी-रस्सी, टोकरी, दीपक, साड़ी-ब्लाउज, लोटे में शक्कर भरकर, पांच बर्तन, छह मोती, छह मूंगा, यमराज जी की लोहे की मूर्ति, धर्मराज जी की सोने की मूर्ति, चांदी का चांद, सोने का सूरज, चांदी का साठिया ब्राह्मण को दान करें।"
"यदि यह सब दान करना संभव न हो तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही दान करें। प्रतिदिन चावल का साठिया बनाकर कथा सुनें।"
यह सुनकर ब्राह्मणी बोली - "भगवन, मुझे सात दिन के लिए पृथ्वी लोक में वापस भेज दीजिए। मैं कथा सुनकर वापस आ जाऊंगी।"
धर्मराज जी ने उसका लेखा देखकर सात दिन के लिए पृथ्वी पर भेज दिया। ब्राह्मणी पुनः जीवित हो गई और उसने अपने परिवार से कहा - "मैं सात दिन के लिए धर्मराज जी की कथा सुनने हेतु वापस आई हूं। इस कथा को सुनने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है।"
उसने चावल का साठिया बनाकर परिवार के साथ सात दिन तक धर्मराज जी की कथा सुनी। सात दिन पूर्ण होने पर पुनः धर्मराज जी का बुलावा आया और ब्राह्मणी को वैकुण्ठ में श्री हरि के चरणों में स्थान मिला।
जो कोई भी धर्मराज जी की यह कथा श्रद्धा से सुनेगा या सुनाएगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी और वैकुण्ठ धाम में स्थान मिलेगा।