वट सावित्री व्रत कथा – सत्यवान सावित्री की अमर गाथा और व्रत महत्व

वट सावित्री व्रत की यह दिव्य कथा ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर विशेष रूप से सुनाई जाती है। यह व्रत सुहागिन स्त्रियों का सबसे महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। इस कथा में राजकुमारी सावित्री और राजकुमार सत्यवान की पावन प्रेम कहानी है। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए, तो सावित्री ने अपनी अद्भुत बुद्धिमत्ता, पतिव्रता धर्म और दृढ़ निश्चय से यमराज से तीन वरदान प्राप्त किए और अंततः अपने पति के प्राण वापस ले आईं। यह कथा नारी शक्ति, सत्य, धर्म और पतिव्रता धर्म का अनुपम उदाहरण है। जो स्त्रियां वट वृक्ष की पूजा करके इस व्रत को रखती हैं और भक्तिभाव से कथा सुनती हैं, उनके पति को दीर्घायु की प्राप्ति होती है, दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

सावित्री सत्यवान व्रत कथा | वट पूर्णिमा पूजा विधि और महत्व

Hindu Calendar Vrat Katha ज्येष्ठ (Jyeshtha) धार्मिक कथाएँ (Religious Stories) पूजा विधि (Puja Vidhi) व्रत एवं उपवास (Fasting & Vrat)
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परिचय

सावित्री सत्यवान व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर मनाया जाने वाला सुहागिन स्त्रियों का अत्यंत पवित्र व्रत है। यह व्रत पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है। इस कथा में सावित्री एक आदर्श पतिव्रता नारी के रूप में प्रस्तुत होती हैं जिन्होंने अपनी बुद्धिमानी, साहस और अटूट विश्वास से मृत्यु के देवता यमराज को भी परास्त कर दिया। सावित्री की यह गाथा हमें सिखाती है कि सच्चे प्रेम, समर्पण और दृढ़ संकल्प के सामने कोई भी बाधा टिक नहीं सकती। जो महिलाएं इस व्रत को पूर्ण विधि से करती हैं और कथा का श्रवण करती हैं, उन्हें अपने पति के दीर्घ जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

Savitri Satyavan Vrat is a highly sacred fast observed by married women on the Amavasya of Jyeshtha month for their husband's long life and happy married life. In this story, Savitri appears as an ideal devoted wife who defeated even Yamraj, the God of Death, with her intelligence, courage, and unwavering faith. This tale of Savitri teaches us that no obstacle can stand before true love, dedication, and strong determination. Women who observe this fast with complete rituals and listen to the story receive blessings for their husband's long life.

सावित्री सत्यवान व्रत कथा | वट पूर्णिमा पूजा विधि और महत्व

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🌿 सावित्री सत्यवान व्रत कथा एवं पूजन प्रक्रिया 🌿

**व्रत का समय:**
यह पावन व्रत ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन संपन्न होता है। यह विवाहित महिलाओं का प्रमुख पर्व है।

**पूजन विधि:**
इस दिन सावित्री, सत्यवान और यमदेव की आराधना की जाती है। सावित्री ने इसी व्रत की महिमा और अपनी पतिव्रता शक्ति से अपने दिवंगत पति के प्राणों को यमलोक से पुनः प्राप्त किया था।

**पूजा की प्रक्रिया:**
बरगद के वृक्ष के नीचे मिट्टी से बनी सावित्री-सत्यवान की मूर्तियां और भैंस पर विराजमान यमदेव की प्रतिमा रखकर पूजा करें। वृक्ष की जड़ों को जल अर्पित करें।

पूजा में आवश्यक सामग्री: शुद्ध जल, मौली, रोली, कच्चा धागा, भिगोए चने, फूल और धूप-दीप।

जल से बरगद के पेड़ को सींचें, तने पर कच्चा धागा लपेटें और तीन परिक्रमा करें। फिर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें। भीगे चनों का बायना बनाकर धन रखें और सास को समर्पित कर उनके पैर छुएं।

**कथा:**

प्राचीन समय में मद्र प्रदेश में एक प्रतापी नरेश अश्वपति राज करते थे। वे और उनकी रानी संतानहीन थे। दोनों ने देवी सावित्री की कठोर तपस्या की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक कन्या का वरदान दिया।

निश्चित समय पर देवी सावित्री के अंश से एक अद्भुत कन्या का जन्म हुआ। राजा ने उसका नाम सावित्री रखा। सावित्री सभी गुणों से परिपूर्ण थी।

जब सावित्री युवा हुई, तो राजा अश्वपति ने उसे अपने मंत्रियों के साथ अपना जीवनसाथी चुनने भेजा। सावित्री ने देश-विदेश भ्रमण किया और अपनी पसंद का वर चुनकर लौटी।

उसी समय देवर्षि नारद राजमहल में पधारे। उन्होंने पूछा, "राजकुमारी ने किसे चुना है?" सावित्री ने विनम्रता से कहा, "मुनिवर! मैंने राजा द्युमत्सेन के सुपुत्र सत्यवान को अपना जीवनसाथी चुना है।"

नारद मुनि ने दोनों की कुंडली देखी और राजा को बधाई दी। साथ ही सत्यवान के अनगिनत सद्गुणों की प्रशंसा की। लेकिन फिर बोले, "राजन! सत्यवान अल्पायु हैं। विवाह के बारह वर्ष पश्चात उनकी आयु समाप्त हो जाएगी।"

यह सुनकर राजा चिंतित हो गए। उन्होंने सावित्री से दूसरा वर चुनने को कहा। परंतु सावित्री ने कहा, "पिताजी! मैं एक बार किसी को जीवनसाथी चुन चुकी हूं। अब चाहे उनकी आयु कम हो या अधिक, मैं किसी और को नहीं चुनूंगी।"

सावित्री ने नारद जी से सत्यवान की मृत्यु का ठीक समय पूछ लिया। जल्द ही दोनों का विवाह हो गया। विवाह के बाद सावित्री अपने ससुराल वालों के साथ वन में रहने लगी।

नारद जी ने जो दिन बताया था, उससे तीन दिन पहले से सावित्री ने उपवास रखना शुरू कर दिया। जब वह निर्धारित दिन आया, सत्यवान जंगल में लकड़ियां काटने जाने लगे तो सावित्री ने ससुराल वालों से अनुमति लेकर उनके साथ जाने का निर्णय लिया।

जंगल पहुंचकर सत्यवान एक ऊंचे पेड़ पर चढ़कर लकड़ियां काटने लगे। अचानक उन्हें तीव्र सिरदर्द हुआ। वे तुरंत नीचे उतर आए। सावित्री ने उन्हें बरगद के पेड़ की छाया में लिटा दिया और उनका सिर अपनी गोद में रख लिया।

कुछ ही समय में यमदेव प्रकट हुए और विधाता के लिखे अनुसार सत्यवान की आत्मा को अपने साथ ले चले। सावित्री ने सत्यवान को वहीं लिटाया और यमदेव के पीछे चल पड़ी।

यमदेव ने पीछे आती सावित्री को देखा और बोले, "हे देवी! तुम वापस लौट जाओ।" 

सावित्री ने कहा, "हे यमदेव! पत्नी का स्थान वहीं है जहां उसके पति हों। यही सनातन धर्म है।"

सावित्री के धर्म ज्ञान से प्रभावित होकर यमदेव बोले, "पति के प्राण के अलावा जो चाहो मांग लो।"

सावित्री ने कहा, "मेरे सास-ससुर अंधे हैं और राज्यहीन। कृपया उन्हें दृष्टि और दीर्घजीवन प्रदान करें।"

यमदेव ने "तथास्तु" कहा और आगे बढ़े। पर सावित्री फिर भी उनके पीछे चलती रही।

यमदेव ने फिर कहा, "देवी! अब लौट जाओ।"

सावित्री बोली, "प्रभु! पति के बिना स्त्री का जीवन निरर्थक है।"

यमदेव उसके समर्पण से प्रभावित हुए और बोले, "कुछ और मांगो।"

सावित्री ने कहा, "मेरे श्वसुर का राज्य उन्हें वापस मिल जाए।"

यमदेव ने "तथास्तु" कहा और चल दिए। फिर भी सावित्री उनके पीछे चलती रही।

इस बार सावित्री ने कहा, "हे यमदेव! मुझे सौ पुत्रों का आशीर्वाद दें।"

यमदेव ने "तथास्तु" कहा और आगे बढ़ने लगे।

तब सावित्री बोली, "प्रभु! आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया, पर पति के बिना मैं माता कैसे बनूंगी? कृपया अपना तीसरा वरदान भी पूर्ण करें।"

सावित्री की बुद्धिमत्ता, धैर्य और पतिव्रत धर्म देखकर यमदेव ने सत्यवान की आत्मा को मुक्त कर दिया।

सावित्री प्रसन्नतापूर्वक सत्यवान के पास लौटी। उसने बरगद के पेड़ की परिक्रमा की। तुरंत सत्यवान जीवित हो उठे।

खुश होकर सावित्री अपने ससुराल लौटी। उसके सास-ससुर को दृष्टि मिल गई। कुछ समय बाद उन्हें उनका राज्य भी वापस मिल गया। बाद में सावित्री सौ पुत्रों की माता बनी।

इस प्रकार सावित्री के पतिव्रत धर्म, बुद्धिमानी और साहस की गाथा सर्वत्र फैल गई।

**व्रत का लाभ:**
जो विवाहित स्त्रियां इस व्रत को विधिपूर्वक करती हैं और श्रद्धा से कथा सुनती हैं, उनके पति को दीर्घजीवन प्राप्त होता है और दांपत्य जीवन खुशहाल रहता है।

हे सावित्री माता! हे यमदेव! जैसे आपने सावित्री पर कृपा की, वैसे ही सभी सुहागिन स्त्रियों के पति को दीर्घायु दें।

🙏 सावित्री माता की जय 🙏

🌿 सावित्री सत्यवान व्रत कथा एवं पूजन प्रक्रिया 🌿

**व्रत का समय:**
यह पावन व्रत ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन संपन्न होता है। यह विवाहित महिलाओं का प्रमुख पर्व है।

**पूजन विधि:**
इस दिन सावित्री, सत्यवान और यमदेव की आराधना की जाती है। सावित्री ने इसी व्रत की महिमा और अपनी पतिव्रता शक्ति से अपने दिवंगत पति के प्राणों को यमलोक से पुनः प्राप्त किया था।

**पूजा की प्रक्रिया:**
बरगद के वृक्ष के नीचे मिट्टी से बनी सावित्री-सत्यवान की मूर्तियां और भैंस पर विराजमान यमदेव की प्रतिमा रखकर पूजा करें। वृक्ष की जड़ों को जल अर्पित करें।

पूजा में आवश्यक सामग्री: शुद्ध जल, मौली, रोली, कच्चा धागा, भिगोए चने, फूल और धूप-दीप।

जल से बरगद के पेड़ को सींचें, तने पर कच्चा धागा लपेटें और तीन परिक्रमा करें। फिर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें। भीगे चनों का बायना बनाकर धन रखें और सास को समर्पित कर उनके पैर छुएं।

**कथा:**

प्राचीन समय में मद्र प्रदेश में एक प्रतापी नरेश अश्वपति राज करते थे। वे और उनकी रानी संतानहीन थे। दोनों ने देवी सावित्री की कठोर तपस्या की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक कन्या का वरदान दिया।

निश्चित समय पर देवी सावित्री के अंश से एक अद्भुत कन्या का जन्म हुआ। राजा ने उसका नाम सावित्री रखा। सावित्री सभी गुणों से परिपूर्ण थी।

जब सावित्री युवा हुई, तो राजा अश्वपति ने उसे अपने मंत्रियों के साथ अपना जीवनसाथी चुनने भेजा। सावित्री ने देश-विदेश भ्रमण किया और अपनी पसंद का वर चुनकर लौटी।

उसी समय देवर्षि नारद राजमहल में पधारे। उन्होंने पूछा, "राजकुमारी ने किसे चुना है?" सावित्री ने विनम्रता से कहा, "मुनिवर! मैंने राजा द्युमत्सेन के सुपुत्र सत्यवान को अपना जीवनसाथी चुना है।"

नारद मुनि ने दोनों की कुंडली देखी और राजा को बधाई दी। साथ ही सत्यवान के अनगिनत सद्गुणों की प्रशंसा की। लेकिन फिर बोले, "राजन! सत्यवान अल्पायु हैं। विवाह के बारह वर्ष पश्चात उनकी आयु समाप्त हो जाएगी।"

यह सुनकर राजा चिंतित हो गए। उन्होंने सावित्री से दूसरा वर चुनने को कहा। परंतु सावित्री ने कहा, "पिताजी! मैं एक बार किसी को जीवनसाथी चुन चुकी हूं। अब चाहे उनकी आयु कम हो या अधिक, मैं किसी और को नहीं चुनूंगी।"

सावित्री ने नारद जी से सत्यवान की मृत्यु का ठीक समय पूछ लिया। जल्द ही दोनों का विवाह हो गया। विवाह के बाद सावित्री अपने ससुराल वालों के साथ वन में रहने लगी।

नारद जी ने जो दिन बताया था, उससे तीन दिन पहले से सावित्री ने उपवास रखना शुरू कर दिया। जब वह निर्धारित दिन आया, सत्यवान जंगल में लकड़ियां काटने जाने लगे तो सावित्री ने ससुराल वालों से अनुमति लेकर उनके साथ जाने का निर्णय लिया।

जंगल पहुंचकर सत्यवान एक ऊंचे पेड़ पर चढ़कर लकड़ियां काटने लगे। अचानक उन्हें तीव्र सिरदर्द हुआ। वे तुरंत नीचे उतर आए। सावित्री ने उन्हें बरगद के पेड़ की छाया में लिटा दिया और उनका सिर अपनी गोद में रख लिया।

कुछ ही समय में यमदेव प्रकट हुए और विधाता के लिखे अनुसार सत्यवान की आत्मा को अपने साथ ले चले। सावित्री ने सत्यवान को वहीं लिटाया और यमदेव के पीछे चल पड़ी।

यमदेव ने पीछे आती सावित्री को देखा और बोले, "हे देवी! तुम वापस लौट जाओ।" 

सावित्री ने कहा, "हे यमदेव! पत्नी का स्थान वहीं है जहां उसके पति हों। यही सनातन धर्म है।"

सावित्री के धर्म ज्ञान से प्रभावित होकर यमदेव बोले, "पति के प्राण के अलावा जो चाहो मांग लो।"

सावित्री ने कहा, "मेरे सास-ससुर अंधे हैं और राज्यहीन। कृपया उन्हें दृष्टि और दीर्घजीवन प्रदान करें।"

यमदेव ने "तथास्तु" कहा और आगे बढ़े। पर सावित्री फिर भी उनके पीछे चलती रही।

यमदेव ने फिर कहा, "देवी! अब लौट जाओ।"

सावित्री बोली, "प्रभु! पति के बिना स्त्री का जीवन निरर्थक है।"

यमदेव उसके समर्पण से प्रभावित हुए और बोले, "कुछ और मांगो।"

सावित्री ने कहा, "मेरे श्वसुर का राज्य उन्हें वापस मिल जाए।"

यमदेव ने "तथास्तु" कहा और चल दिए। फिर भी सावित्री उनके पीछे चलती रही।

इस बार सावित्री ने कहा, "हे यमदेव! मुझे सौ पुत्रों का आशीर्वाद दें।"

यमदेव ने "तथास्तु" कहा और आगे बढ़ने लगे।

तब सावित्री बोली, "प्रभु! आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया, पर पति के बिना मैं माता कैसे बनूंगी? कृपया अपना तीसरा वरदान भी पूर्ण करें।"

सावित्री की बुद्धिमत्ता, धैर्य और पतिव्रत धर्म देखकर यमदेव ने सत्यवान की आत्मा को मुक्त कर दिया।

सावित्री प्रसन्नतापूर्वक सत्यवान के पास लौटी। उसने बरगद के पेड़ की परिक्रमा की। तुरंत सत्यवान जीवित हो उठे।

खुश होकर सावित्री अपने ससुराल लौटी। उसके सास-ससुर को दृष्टि मिल गई। कुछ समय बाद उन्हें उनका राज्य भी वापस मिल गया। बाद में सावित्री सौ पुत्रों की माता बनी।

इस प्रकार सावित्री के पतिव्रत धर्म, बुद्धिमानी और साहस की गाथा सर्वत्र फैल गई।

**व्रत का लाभ:**
जो विवाहित स्त्रियां इस व्रत को विधिपूर्वक करती हैं और श्रद्धा से कथा सुनती हैं, उनके पति को दीर्घजीवन प्राप्त होता है और दांपत्य जीवन खुशहाल रहता है।

हे सावित्री माता! हे यमदेव! जैसे आपने सावित्री पर कृपा की, वैसे ही सभी सुहागिन स्त्रियों के पति को दीर्घायु दें।

🙏 सावित्री माता की जय 🙏

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Hinglish

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🌿 Savitri Satyavan Vrat Katha evam Pujan Prakriya 🌿

**Vrat ka Samay:**
Yeh pavan vrat Jyeshtha maah ke Krishna Paksh ki Amavasya ke din sampann hota hai. Yeh vivahit mahilaon ka pramukh parv hai.

**Pujan Vidhi:**
Is din Savitri, Satyavan aur Yamdev ki aaradhana ki jati hai. Savitri ne isi vrat ki mahima aur apni pativrata shakti se apne divangat pati ke pranon ko Yamlok se punah prapt kiya tha.

**Puja ki Prakriya:**
Bargad ke vriksh ke niche mitti se bani Savitri-Satyavan ki moortiyan aur bhains par virajman Yamdev ki pratima rakhkar puja karen. Vriksh ki jadon ko jal arpit karen.

Puja mein aavashyak samagri: shuddh jal, mauli, roli, kachcha dhaga, bhigoe chane, phool aur dhoop-deep.

Jal se bargad ke ped ko seenchen, tane par kachcha dhaga lapeten aur teen parikrama karen. Phir Savitri-Satyavan ki katha sunen. Bheege chanon ka bayana banakar dhan rakhen aur saas ko samarpit kar unke pair chhuyen.

**Katha:**

Prachin samay mein Madr Pradesh mein ek pratapi naresh Ashwapati raj karte the. Ve aur unki rani santanheen the. Donon ne Devi Savitri ki kathor tapasya ki. Unki aaradhana se prasann hokar Devi ne unhe ek kanya ka vardan diya.

Nishchit samay par Devi Savitri ke ansh se ek adbhut kanya ka janm hua. Raja ne uska naam Savitri rakha. Savitri sabhi gunon se paripurna thi.

Jab Savitri yuva hui, to Raja Ashwapati ne use apne mantriyon ke saath apna jeevan saathi chunne bheja. Savitri ne desh-videsh bhraman kiya aur apni pasand ka var chunkar lauti.

Usi samay Devarshi Narad rajmahal mein padhare. Unhone poocha, "Rajkumari ne kise chuna hai?" Savitri ne vinamrata se kaha, "Munivar! Maine Raja Dyumatsen ke suputra Satyavan ko apna jeevan saathi chuna hai."

Narad Muni ne donon ki kundali dekhi aur Raja ko badhai di. Saath hi Satyavan ke anginat sadgunon ki prashansa ki. Lekin phir bole, "Rajan! Satyavan alpaayu hain. Vivah ke barah varsh pashchat unki aayu samapt ho jayegi."

Yeh sunkar Raja chintit ho gaye. Unhone Savitri se doosra var chunne ko kaha. Parantu Savitri ne kaha, "Pitaji! Main ek baar kisi ko jeevan saathi chun chuki hoon. Ab chahe unki aayu kam ho ya adhik, main kisi aur ko nahi chunungi."

Savitri ne Narad ji se Satyavan ki mrityu ka theek samay pooch liya. Jald hi donon ka vivah ho gaya. Vivah ke baad Savitri apne sasural walon ke saath van mein rehne lagi.

Narad ji ne jo din bataya tha, usse teen din pehle se Savitri ne upvas rakhna shuru kar diya. Jab vah nirdharit din aaya, Satyavan jangal mein lakdiyan kaatne jaane lage to Savitri ne sasural walon se anumati lekar unke saath jaane ka nirnay liya.

Jangal pahunchkar Satyavan ek oonche ped par chadhkar lakdiyan kaatne lage. Achanak unhe teevra sirdard hua. Ve turant niche utar aaye. Savitri ne unhe bargad ke ped ki chhaya mein lita diya aur unka sir apni god mein rakh liya.

Kuch hi samay mein Yamdev prakat hue aur Vidhata ke likhe anusar Satyavan ki aatma ko apne saath le chale. Savitri ne Satyavan ko vahin litaya aur Yamdev ke piche chal padi.

Yamdev ne piche aati Savitri ko dekha aur bole, "He Devi! Tum vapas laut jao."

Savitri ne kaha, "He Yamdev! Patni ka sthan vahin hai jahan uske pati hon. Yahi sanatan dharm hai."

Savitri ke dharm gyaan se prabhavit hokar Yamdev bole, "Pati ke pran ke alava jo chaho maang lo."

Savitri ne kaha, "Mere saas-sasur andhe hain aur rajyaheen. Kripya unhe drishti aur deerghajeevan pradan karen."

Yamdev ne "tathastu" kaha aur aage badhe. Par Savitri phir bhi unke piche chalti rahi.

Yamdev ne phir kaha, "Devi! Ab laut jao."

Savitri boli, "Prabhu! Pati ke bina stri ka jeevan nirarthak hai."

Yamdev uske samarpan se prabhavit hue aur bole, "Kuch aur maango."

Savitri ne kaha, "Mere shvasur ka rajya unhe vapas mil jaye."

Yamdev ne "tathastu" kaha aur chal diye. Phir bhi Savitri unke piche chalti rahi.

Is baar Savitri ne kaha, "He Yamdev! Mujhe sau putron ka aashirwad den."

Yamdev ne "tathastu" kaha aur aage badhne lage.

Tab Savitri boli, "Prabhu! Aapne mujhe sau putron ka vardan diya, par pati ke bina main mata kaise banungi? Kripya apna teesra vardan bhi poorn karen."

Savitri ki buddhimatta, dhairya aur pativrat dharm dekhkar Yamdev ne Satyavan ki aatma ko mukt kar diya.

Savitri prasannatapurvak Satyavan ke paas lauti. Usne bargad ke ped ki parikrama ki. Turant Satyavan jeevit ho uthe.

Khush hokar Savitri apne sasural lauti. Uske saas-sasur ko drishti mil gayi. Kuch samay baad unhe unka rajya bhi vapas mil gaya. Baad mein Savitri sau putron ki mata bani.

Is prakaar Savitri ke pativrat dharm, buddhimani aur saahas ki gatha sarvatra fail gayi.

**Vrat ka Laabh:**
Jo vivahit striyan is vrat ko vidhipurvak karti hain aur shraddha se katha sunti hain, unke pati ko deerghjeevan prapt hota hai aur daampaty jeevan khushhal rahta hai.

He Savitri Mata! He Yamdev! Jaise aapne Savitri par kripa ki, vaise hi sabhi suhagan striyon ke pati ko deerghaayu den.

🙏 Savitri Mata Ki Jai 🙏