महाशिवरात्रि व्रत कथा | शिव पार्वती विवाह और पूजा विधि
🙏 महाशिवरात्रि व्रत कथा 🙏 **महाशिवरात्रि का महत्व:** महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का सर्वाधिक पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह व्रत फाल...
पढ़ें →वट सावित्री व्रत की यह दिव्य कथा ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर विशेष रूप से सुनाई जाती है। यह व्रत सुहागिन स्त्रियों का सबसे महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। इस कथा में राजकुमारी सावित्री और राजकुमार सत्यवान की पावन प्रेम कहानी है। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए, तो सावित्री ने अपनी अद्भुत बुद्धिमत्ता, पतिव्रता धर्म और दृढ़ निश्चय से यमराज से तीन वरदान प्राप्त किए और अंततः अपने पति के प्राण वापस ले आईं। यह कथा नारी शक्ति, सत्य, धर्म और पतिव्रता धर्म का अनुपम उदाहरण है। जो स्त्रियां वट वृक्ष की पूजा करके इस व्रत को रखती हैं और भक्तिभाव से कथा सुनती हैं, उनके पति को दीर्घायु की प्राप्ति होती है, दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
🌿 सावित्री सत्यवान व्रत कथा एवं पूजन प्रक्रिया 🌿
**व्रत का समय:**
यह पावन व्रत ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन संपन्न होता है। यह विवाहित महिलाओं का प्रमुख पर्व है।
**पूजन विधि:**
इस दिन सावित्री, सत्यवान और यमदेव की आराधना की जाती है। सावित्री ने इसी व्रत की महिमा और अपनी पतिव्रता शक्ति से अपने दिवंगत पति के प्राणों को यमलोक से पुनः प्राप्त किया था।
**पूजा की प्रक्रिया:**
बरगद के वृक्ष के नीचे मिट्टी से बनी सावित्री-सत्यवान की मूर्तियां और भैंस पर विराजमान यमदेव की प्रतिमा रखकर पूजा करें। वृक्ष की जड़ों को जल अर्पित करें।
पूजा में आवश्यक सामग्री: शुद्ध जल, मौली, रोली, कच्चा धागा, भिगोए चने, फूल और धूप-दीप।
जल से बरगद के पेड़ को सींचें, तने पर कच्चा धागा लपेटें और तीन परिक्रमा करें। फिर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें। भीगे चनों का बायना बनाकर धन रखें और सास को समर्पित कर उनके पैर छुएं।
**कथा:**
प्राचीन समय में मद्र प्रदेश में एक प्रतापी नरेश अश्वपति राज करते थे। वे और उनकी रानी संतानहीन थे। दोनों ने देवी सावित्री की कठोर तपस्या की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक कन्या का वरदान दिया।
निश्चित समय पर देवी सावित्री के अंश से एक अद्भुत कन्या का जन्म हुआ। राजा ने उसका नाम सावित्री रखा। सावित्री सभी गुणों से परिपूर्ण थी।
जब सावित्री युवा हुई, तो राजा अश्वपति ने उसे अपने मंत्रियों के साथ अपना जीवनसाथी चुनने भेजा। सावित्री ने देश-विदेश भ्रमण किया और अपनी पसंद का वर चुनकर लौटी।
उसी समय देवर्षि नारद राजमहल में पधारे। उन्होंने पूछा, "राजकुमारी ने किसे चुना है?" सावित्री ने विनम्रता से कहा, "मुनिवर! मैंने राजा द्युमत्सेन के सुपुत्र सत्यवान को अपना जीवनसाथी चुना है।"
नारद मुनि ने दोनों की कुंडली देखी और राजा को बधाई दी। साथ ही सत्यवान के अनगिनत सद्गुणों की प्रशंसा की। लेकिन फिर बोले, "राजन! सत्यवान अल्पायु हैं। विवाह के बारह वर्ष पश्चात उनकी आयु समाप्त हो जाएगी।"
यह सुनकर राजा चिंतित हो गए। उन्होंने सावित्री से दूसरा वर चुनने को कहा। परंतु सावित्री ने कहा, "पिताजी! मैं एक बार किसी को जीवनसाथी चुन चुकी हूं। अब चाहे उनकी आयु कम हो या अधिक, मैं किसी और को नहीं चुनूंगी।"
सावित्री ने नारद जी से सत्यवान की मृत्यु का ठीक समय पूछ लिया। जल्द ही दोनों का विवाह हो गया। विवाह के बाद सावित्री अपने ससुराल वालों के साथ वन में रहने लगी।
नारद जी ने जो दिन बताया था, उससे तीन दिन पहले से सावित्री ने उपवास रखना शुरू कर दिया। जब वह निर्धारित दिन आया, सत्यवान जंगल में लकड़ियां काटने जाने लगे तो सावित्री ने ससुराल वालों से अनुमति लेकर उनके साथ जाने का निर्णय लिया।
जंगल पहुंचकर सत्यवान एक ऊंचे पेड़ पर चढ़कर लकड़ियां काटने लगे। अचानक उन्हें तीव्र सिरदर्द हुआ। वे तुरंत नीचे उतर आए। सावित्री ने उन्हें बरगद के पेड़ की छाया में लिटा दिया और उनका सिर अपनी गोद में रख लिया।
कुछ ही समय में यमदेव प्रकट हुए और विधाता के लिखे अनुसार सत्यवान की आत्मा को अपने साथ ले चले। सावित्री ने सत्यवान को वहीं लिटाया और यमदेव के पीछे चल पड़ी।
यमदेव ने पीछे आती सावित्री को देखा और बोले, "हे देवी! तुम वापस लौट जाओ।"
सावित्री ने कहा, "हे यमदेव! पत्नी का स्थान वहीं है जहां उसके पति हों। यही सनातन धर्म है।"
सावित्री के धर्म ज्ञान से प्रभावित होकर यमदेव बोले, "पति के प्राण के अलावा जो चाहो मांग लो।"
सावित्री ने कहा, "मेरे सास-ससुर अंधे हैं और राज्यहीन। कृपया उन्हें दृष्टि और दीर्घजीवन प्रदान करें।"
यमदेव ने "तथास्तु" कहा और आगे बढ़े। पर सावित्री फिर भी उनके पीछे चलती रही।
यमदेव ने फिर कहा, "देवी! अब लौट जाओ।"
सावित्री बोली, "प्रभु! पति के बिना स्त्री का जीवन निरर्थक है।"
यमदेव उसके समर्पण से प्रभावित हुए और बोले, "कुछ और मांगो।"
सावित्री ने कहा, "मेरे श्वसुर का राज्य उन्हें वापस मिल जाए।"
यमदेव ने "तथास्तु" कहा और चल दिए। फिर भी सावित्री उनके पीछे चलती रही।
इस बार सावित्री ने कहा, "हे यमदेव! मुझे सौ पुत्रों का आशीर्वाद दें।"
यमदेव ने "तथास्तु" कहा और आगे बढ़ने लगे।
तब सावित्री बोली, "प्रभु! आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया, पर पति के बिना मैं माता कैसे बनूंगी? कृपया अपना तीसरा वरदान भी पूर्ण करें।"
सावित्री की बुद्धिमत्ता, धैर्य और पतिव्रत धर्म देखकर यमदेव ने सत्यवान की आत्मा को मुक्त कर दिया।
सावित्री प्रसन्नतापूर्वक सत्यवान के पास लौटी। उसने बरगद के पेड़ की परिक्रमा की। तुरंत सत्यवान जीवित हो उठे।
खुश होकर सावित्री अपने ससुराल लौटी। उसके सास-ससुर को दृष्टि मिल गई। कुछ समय बाद उन्हें उनका राज्य भी वापस मिल गया। बाद में सावित्री सौ पुत्रों की माता बनी।
इस प्रकार सावित्री के पतिव्रत धर्म, बुद्धिमानी और साहस की गाथा सर्वत्र फैल गई।
**व्रत का लाभ:**
जो विवाहित स्त्रियां इस व्रत को विधिपूर्वक करती हैं और श्रद्धा से कथा सुनती हैं, उनके पति को दीर्घजीवन प्राप्त होता है और दांपत्य जीवन खुशहाल रहता है।
हे सावित्री माता! हे यमदेव! जैसे आपने सावित्री पर कृपा की, वैसे ही सभी सुहागिन स्त्रियों के पति को दीर्घायु दें।
🙏 सावित्री माता की जय 🙏
🌿 सावित्री सत्यवान व्रत कथा एवं पूजन प्रक्रिया 🌿
**व्रत का समय:**
यह पावन व्रत ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन संपन्न होता है। यह विवाहित महिलाओं का प्रमुख पर्व है।
**पूजन विधि:**
इस दिन सावित्री, सत्यवान और यमदेव की आराधना की जाती है। सावित्री ने इसी व्रत की महिमा और अपनी पतिव्रता शक्ति से अपने दिवंगत पति के प्राणों को यमलोक से पुनः प्राप्त किया था।
**पूजा की प्रक्रिया:**
बरगद के वृक्ष के नीचे मिट्टी से बनी सावित्री-सत्यवान की मूर्तियां और भैंस पर विराजमान यमदेव की प्रतिमा रखकर पूजा करें। वृक्ष की जड़ों को जल अर्पित करें।
पूजा में आवश्यक सामग्री: शुद्ध जल, मौली, रोली, कच्चा धागा, भिगोए चने, फूल और धूप-दीप।
जल से बरगद के पेड़ को सींचें, तने पर कच्चा धागा लपेटें और तीन परिक्रमा करें। फिर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें। भीगे चनों का बायना बनाकर धन रखें और सास को समर्पित कर उनके पैर छुएं।
**कथा:**
प्राचीन समय में मद्र प्रदेश में एक प्रतापी नरेश अश्वपति राज करते थे। वे और उनकी रानी संतानहीन थे। दोनों ने देवी सावित्री की कठोर तपस्या की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक कन्या का वरदान दिया।
निश्चित समय पर देवी सावित्री के अंश से एक अद्भुत कन्या का जन्म हुआ। राजा ने उसका नाम सावित्री रखा। सावित्री सभी गुणों से परिपूर्ण थी।
जब सावित्री युवा हुई, तो राजा अश्वपति ने उसे अपने मंत्रियों के साथ अपना जीवनसाथी चुनने भेजा। सावित्री ने देश-विदेश भ्रमण किया और अपनी पसंद का वर चुनकर लौटी।
उसी समय देवर्षि नारद राजमहल में पधारे। उन्होंने पूछा, "राजकुमारी ने किसे चुना है?" सावित्री ने विनम्रता से कहा, "मुनिवर! मैंने राजा द्युमत्सेन के सुपुत्र सत्यवान को अपना जीवनसाथी चुना है।"
नारद मुनि ने दोनों की कुंडली देखी और राजा को बधाई दी। साथ ही सत्यवान के अनगिनत सद्गुणों की प्रशंसा की। लेकिन फिर बोले, "राजन! सत्यवान अल्पायु हैं। विवाह के बारह वर्ष पश्चात उनकी आयु समाप्त हो जाएगी।"
यह सुनकर राजा चिंतित हो गए। उन्होंने सावित्री से दूसरा वर चुनने को कहा। परंतु सावित्री ने कहा, "पिताजी! मैं एक बार किसी को जीवनसाथी चुन चुकी हूं। अब चाहे उनकी आयु कम हो या अधिक, मैं किसी और को नहीं चुनूंगी।"
सावित्री ने नारद जी से सत्यवान की मृत्यु का ठीक समय पूछ लिया। जल्द ही दोनों का विवाह हो गया। विवाह के बाद सावित्री अपने ससुराल वालों के साथ वन में रहने लगी।
नारद जी ने जो दिन बताया था, उससे तीन दिन पहले से सावित्री ने उपवास रखना शुरू कर दिया। जब वह निर्धारित दिन आया, सत्यवान जंगल में लकड़ियां काटने जाने लगे तो सावित्री ने ससुराल वालों से अनुमति लेकर उनके साथ जाने का निर्णय लिया।
जंगल पहुंचकर सत्यवान एक ऊंचे पेड़ पर चढ़कर लकड़ियां काटने लगे। अचानक उन्हें तीव्र सिरदर्द हुआ। वे तुरंत नीचे उतर आए। सावित्री ने उन्हें बरगद के पेड़ की छाया में लिटा दिया और उनका सिर अपनी गोद में रख लिया।
कुछ ही समय में यमदेव प्रकट हुए और विधाता के लिखे अनुसार सत्यवान की आत्मा को अपने साथ ले चले। सावित्री ने सत्यवान को वहीं लिटाया और यमदेव के पीछे चल पड़ी।
यमदेव ने पीछे आती सावित्री को देखा और बोले, "हे देवी! तुम वापस लौट जाओ।"
सावित्री ने कहा, "हे यमदेव! पत्नी का स्थान वहीं है जहां उसके पति हों। यही सनातन धर्म है।"
सावित्री के धर्म ज्ञान से प्रभावित होकर यमदेव बोले, "पति के प्राण के अलावा जो चाहो मांग लो।"
सावित्री ने कहा, "मेरे सास-ससुर अंधे हैं और राज्यहीन। कृपया उन्हें दृष्टि और दीर्घजीवन प्रदान करें।"
यमदेव ने "तथास्तु" कहा और आगे बढ़े। पर सावित्री फिर भी उनके पीछे चलती रही।
यमदेव ने फिर कहा, "देवी! अब लौट जाओ।"
सावित्री बोली, "प्रभु! पति के बिना स्त्री का जीवन निरर्थक है।"
यमदेव उसके समर्पण से प्रभावित हुए और बोले, "कुछ और मांगो।"
सावित्री ने कहा, "मेरे श्वसुर का राज्य उन्हें वापस मिल जाए।"
यमदेव ने "तथास्तु" कहा और चल दिए। फिर भी सावित्री उनके पीछे चलती रही।
इस बार सावित्री ने कहा, "हे यमदेव! मुझे सौ पुत्रों का आशीर्वाद दें।"
यमदेव ने "तथास्तु" कहा और आगे बढ़ने लगे।
तब सावित्री बोली, "प्रभु! आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया, पर पति के बिना मैं माता कैसे बनूंगी? कृपया अपना तीसरा वरदान भी पूर्ण करें।"
सावित्री की बुद्धिमत्ता, धैर्य और पतिव्रत धर्म देखकर यमदेव ने सत्यवान की आत्मा को मुक्त कर दिया।
सावित्री प्रसन्नतापूर्वक सत्यवान के पास लौटी। उसने बरगद के पेड़ की परिक्रमा की। तुरंत सत्यवान जीवित हो उठे।
खुश होकर सावित्री अपने ससुराल लौटी। उसके सास-ससुर को दृष्टि मिल गई। कुछ समय बाद उन्हें उनका राज्य भी वापस मिल गया। बाद में सावित्री सौ पुत्रों की माता बनी।
इस प्रकार सावित्री के पतिव्रत धर्म, बुद्धिमानी और साहस की गाथा सर्वत्र फैल गई।
**व्रत का लाभ:**
जो विवाहित स्त्रियां इस व्रत को विधिपूर्वक करती हैं और श्रद्धा से कथा सुनती हैं, उनके पति को दीर्घजीवन प्राप्त होता है और दांपत्य जीवन खुशहाल रहता है।
हे सावित्री माता! हे यमदेव! जैसे आपने सावित्री पर कृपा की, वैसे ही सभी सुहागिन स्त्रियों के पति को दीर्घायु दें।
🙏 सावित्री माता की जय 🙏