सत्यनारायण व्रत कथा – मोक्ष और मनोकामना पूर्ति का मार्ग

सत्यनारायण व्रत की यह पावन कथा पांच अध्यायों में विभाजित अत्यंत फलदायी व्रत कथा है। यह व्रत भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप को समर्पित है और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है। इस कथा में बताया गया है कि कैसे देवर्षि नारद ने मानव कल्याण के लिए भगवान विष्णु से इस सरल व्रत का ज्ञान प्राप्त किया। इस व्रत को करने से निर्धन धनवान हो जाता है, संतानहीन को पुत्र प्राप्ति होती है, भयमुक्त जीवन मिलता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। कथा में एक निर्धन ब्राह्मण, लकड़हारे, राजा उल्कामुख, साधु वैश्य और राजा तुंगध्वज के जीवन में आए परिवर्तनों का वर्णन है। जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से इस व्रत को करता है और कथा सुनता है, उसके जीवन में सुख-समृद्धि, धन-संपत्ति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सत्यनारायण व्रत कथा | पांच अध्याय और पूजा विधि

Vrat Katha धार्मिक कथाएँ (Religious Stories) पूजा विधि (Puja Vidhi) व्रत एवं उपवास (Fasting & Vrat)
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परिचय

सत्यनारायण व्रत की यह दिव्य कथा पांच अध्यायों में विभाजित है जो भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की महिमा का वर्णन करती है। यह व्रत अत्यंत सरल और फलदायी है। पहले अध्याय में देवर्षि नारद द्वारा भगवान विष्णु से व्रत विधान प्राप्त करना, दूसरे अध्याय में निर्धन ब्राह्मण और लकड़हारे का जीवन परिवर्तन, तीसरे अध्याय में राजा उल्कामुख और साधु वैश्य की कथा, चौथे अध्याय में प्रसाद के महत्व का वर्णन और पांचवें अध्याय में राजा तुंगध्वज की कथा सम्मिलित है। यह व्रत करने से धन, संतान, सुख-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो भी श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

This divine Satyanarayan Vrat Katha is divided into five chapters describing the glory of Lord Vishnu's Satyanarayan form. This fast is extremely simple and fruitful. The first chapter contains Devarshi Narad receiving the vrat vidhan from Lord Vishnu, the second chapter tells the life transformation of a poor Brahmin and woodcutter, the third chapter narrates the story of King Ulkamukh and merchant Sadhu, the fourth chapter emphasizes the importance of prasad, and the fifth chapter contains King Tungdhwaj's story. By observing this fast, one receives wealth, children, prosperity, and moksha. Whoever observes this fast with devotion, all their wishes are fulfilled.

सत्यनारायण व्रत कथा | पांच अध्याय और पूजा विधि

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🙏 सत्यनारायण व्रत कथा 🙏

**पहला अध्याय**

प्राचीन समय की बात है। नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषियों ने श्री सूतजी से प्रश्न किया - "हे प्रभु! इस कलियुग में वेद विद्या रहित मनुष्यों को भगवान की भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? उनका उद्धार कैसे होगा? कोई ऐसा तप बताइए जिससे शीघ्र ही पुण्य और मनवांछित फल मिल जाए।"

सर्व शास्त्रों के ज्ञाता सूतजी बोले - "हे वैष्णवों में पूज्य! आप सभी ने प्राणियों के हित की बात पूछी है। मैं एक ऐसा श्रेष्ठ व्रत बताऊंगा जिसे नारद जी ने लक्ष्मीनारायण से पूछा था और लक्ष्मीपति ने नारद जी से कहा था।"

एक समय योगीराज नारद जी अनेक लोकों में घूमते हुए मृत्युलोक आए। यहां उन्होंने सभी मनुष्यों को अपने कर्मों द्वारा अनेक दुखों से पीड़ित देखा। उनका दुख देख नारदजी विचार करने लगे कि ऐसा क्या उपाय किया जाए जिससे मानव के दुखों का अंत हो जाए।

यह सोचते हुए वे विष्णुलोक गए। वहां देवाधिदेव नारायण की स्तुति करने लगे जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे।

स्तुति करते हुए नारद जी बोले - "हे भगवान! आप अत्यंत शक्तिशाली हैं। आपका आदि, मध्य और अंत नहीं है। आप भक्तों के दुख दूर करने वाले हैं। आपको नमस्कार है।"

नारदजी की स्तुति सुनकर विष्णु भगवान बोले - "हे मुनिश्रेष्ठ! आपके मन में क्या है? आप किस कार्य के लिए पधारे हैं? निःसंकोच कहें।"

नारद मुनि बोले - "मृत्युलोक में मनुष्य अपने कर्मों द्वारा अनेक दुखों से पीड़ित हैं। हे नाथ! बताइए कि वे मनुष्य थोड़े प्रयास से अपने दुखों से कैसे मुक्त हो सकते हैं?"

श्रीहरि बोले - "हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने उत्तम प्रश्न किया है। स्वर्ग और मृत्युलोक दोनों में एक दुर्लभ उत्तम व्रत है। वह पुण्य देने वाला है। आज प्रेमवश मैं उसे तुमसे कहता हूं। श्री सत्यनारायण भगवान का यह व्रत विधिपूर्वक करके मनुष्य यहां सुख भोगकर, मरने पर मोक्ष पाता है।"

श्रीहरि के वचन सुनकर नारदजी बोले - "उस व्रत का फल क्या है? विधान क्या है? यह व्रत किसने किया? किस दिन करना चाहिए? सब विस्तार से बताएं।"

नारद की बात सुनकर श्रीहरि बोले - "दुख और शोक को दूर करने वाला यह व्रत सभी स्थानों पर विजय दिलाता है। मनुष्य को भक्ति और श्रद्धा के साथ शाम को श्री सत्यनारायण की पूजा ब्राह्मणों और बंधुओं के साथ करनी चाहिए। भक्तिभाव से केला, घी, दूध और गेहूं का आटा लें। गेहूं के स्थान पर साठी का आटा, शक्कर और गुड़ लेकर भगवान का भोग लगाएं।"

"ब्राह्मणों सहित बंधु-बांधवों को भोजन कराएं, उसके बाद स्वयं भोजन करें। भजन-कीर्तन के साथ भगवान की भक्ति में लीन हो जाएं। इस प्रकार सत्यनारायण भगवान का व्रत करने पर मनुष्य की सारी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। यह कलियुग में मोक्ष का सरल उपाय है।"

**दूसरा अध्याय**

सूतजी बोले - "हे ऋषियों! जिसने पहले इस व्रत को किया उसका इतिहास कहता हूं। सुंदर काशीपुरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख-प्यास से परेशान वह पृथ्वी पर घूमता रहता था।"

"ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन ब्राह्मण का वेश धारण किया और उसके पास जाकर पूछा - 'हे विप्र! दुखी होकर तुम क्यों घूमते हो?' दीन ब्राह्मण बोला - 'मैं निर्धन ब्राह्मण हूं। भिक्षा के लिए घूमता हूं। यदि कोई उपाय जानते हों तो बताएं।'"

"वृद्ध ब्राह्मण बोले - 'सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं। तुम उनका पूजन करो। इससे मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।'"

"वृद्ध ब्राह्मण रूपी सत्यनारायण भगवान उस निर्धन ब्राह्मण को व्रत का विधान बताकर अंतर्धान हो गए। ब्राह्मण ने मन में निश्चय किया कि मैं यह व्रत अवश्य करूंगा। उसे रात में नींद नहीं आई। सवेरे उठकर भिक्षा के लिए चला गया।"

"उस दिन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत धन मिला। उसने बंधु-बांधवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत संपन्न किया। व्रत करने के बाद वह निर्धन ब्राह्मण सभी दुखों से मुक्त हो गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से युक्त हो गया। उसी समय से यह ब्राह्मण हर माह व्रत करने लगा।"

"एक समय वही विप्र धन और ऐश्वर्य के अनुसार अपने बंधु-बांधवों के साथ व्रत करने को तैयार हुआ। उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया। लकड़ियां बाहर रखकर अंदर गया। प्यास से दुखी वह लकड़हारा उन्हें व्रत करते देख पूछने लगा कि आप यह क्या कर रहे हैं?"

"ब्राह्मण ने कहा - 'यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है जो सब मनोकामनाएं पूर्ण करता है। इनकी कृपा से मेरे घर में धन-धान्य की वृद्धि हुई है।'"

"विप्र से व्रत के बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। चरणामृत लेकर और प्रसाद खाकर वह घर गया। उसने मन में संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उससे सत्यनारायण भगवान का व्रत करूंगा।"

"लकड़ी बेचने पर उसे पहले से चार गुना अधिक दाम मिला। बूढ़ा प्रसन्नता से केला, शक्कर, घी, दूध, दही और गेहूं का आटा लेकर घर गया। अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर विधिपूर्वक सत्यनारायण भगवान का पूजन किया। इस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से युक्त होकर सुख भोगकर अंत में बैकुंठ धाम गया।"

**तीसरा अध्याय**

सूतजी बोले - "हे श्रेष्ठ मुनियों! अब आगे की कथा कहता हूं। प्राचीन समय में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देव स्थानों पर जाता और निर्धनों को धन देता था। उसकी पत्नी कमल के समान सुंदर और सती-साध्वी थी।"

"भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनों ने सत्यनारायण भगवान का व्रत किया। उसी समय साधु नाम का एक वैश्य आया जिसके पास व्यापार के लिए बहुत धन था। राजा को व्रत करते देखकर विनय से पूछा - 'हे राजन! भक्तिभाव से आप यह क्या कर रहे हैं?'"

"राजा बोला - 'हे साधु! अपने बंधु-बांधवों के साथ पुत्र प्राप्ति के लिए महाशक्तिमान सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन कर रहा हूं।'"

"राजा के वचन सुनकर साधु आदर से बोला - 'हे राजन! मुझे व्रत का विधान बताएं। मैं भी यह व्रत करूंगा। मेरी भी संतान नहीं है।'"

"राजा से व्रत का विधान सुनकर, व्यापार से निवृत्त होकर वह घर गया। साधु ने अपनी पत्नी लीलावती को संतान देने वाले व्रत का वर्णन सुनाया और कहा कि जब मेरी संतान होगी तब मैं यह व्रत करूंगा।"

"एक दिन लीलावती सत्यनारायण भगवान की कृपा से गर्भवती हो गई। दसवें महीने एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया। दिन-दिन वह ऐसे बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष का चंद्रमा। माता-पिता ने कन्या का नाम कलावती रखा।"

"एक दिन लीलावती ने मीठे शब्दों में पति को याद दिलाया कि आपने सत्यनारायण भगवान के व्रत को करने का संकल्प किया था, अब समय आ गया है। साधु बोला - 'हे प्रिये! यह व्रत मैं इसके विवाह पर करूंगा।'"

"साधु ने एक बार कन्या को सखियों के साथ देखा तो दूत को बुलाया और कहा कि योग्य वर देखकर आओ। दूत कंचन नगर गया और योग्य वाणिक पुत्र को ले आया। साधु ने बंधु-बांधवों को बुलाकर कन्या का विवाह कर दिया लेकिन सत्यनारायण भगवान का व्रत नहीं किया।"

"इस पर भगवान क्रोधित हो गए। साधु जमाई को लेकर रत्नासारपुर नगर में गया। वहां चंद्रकेतु राजा के नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान की माया से एक चोर राजा का धन चुराकर भागा और चुराया धन वहां रख दिया जहां साधु ठहरा था।"

"राजा के सिपाहियों ने साधु के पास राजा का धन पड़ा देखा तो ससुर-जमाई दोनों को बांधकर राजा के पास ले गए। राजा की आज्ञा से उन्हें कठिन कारावास में डाल दिया और उनका सारा धन भी छीन लिया गया।"

"सत्यनारायण भगवान के श्राप से साधु की पत्नी भी दुखी हुई। घर में जो धन था चोर चुरा ले गए। शारीरिक और मानसिक पीड़ा से अति दुखी कलावती ब्राह्मण के घर गई। वहां उसने सत्यनारायण भगवान का व्रत देखा और कथा सुनी। प्रसाद ग्रहण कर रात को घर लौटी।"

"कलावती ने माता से कहा - 'मैंने ब्राह्मण के घर सत्यनारायण भगवान का व्रत देखा है।' कन्या के वचन सुनकर लीलावती पूजन की तैयारी करने लगी। लीलावती ने परिवार सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और प्रार्थना की कि मेरे पति और जमाई शीघ्र घर आ जाएं।"

"सत्यनारायण भगवान संतुष्ट हो गए और राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा - 'हे राजन! उन दोनों वैश्यों को छोड़ दो और उनका धन वापस करो। अन्यथा मैं तुम्हारा राज्य नष्ट कर दूंगा।'"

"प्रातःकाल राजा ने सभा में स्वप्न सुनाया और बोले कि बणिक पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाओ। दोनों आए और राजा को प्रणाम किया। राजा बोला - 'भाग्यवश दुख प्राप्त हुआ लेकिन अब कोई भय नहीं।' राजा ने उन्हें नए वस्त्र पहनाए और दुगुना धन वापस कर दिया। दोनों वैश्य अपने घर चल दिए।"

**चौथा अध्याय**

सूतजी बोले - "वैश्य ने मंगलाचार कर यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल दिए। थोड़ी दूर जाने पर एक दंडी वेशधारी सत्यनारायण ने पूछा - 'हे साधु! तेरी नाव में क्या है?'"

"अभिमानी वणिक हंसता हुआ बोला - 'हे दंडी! आप क्यों पूछते हो? मेरी नाव में तो बेल और पत्ते भरे हैं।' वैश्य के कठोर वचन सुनकर भगवान बोले - 'तुम्हारा वचन सत्य हो!' ऐसा कहकर वहां से चले गए।"

"दंडी के जाने के बाद साधु ने नाव को ऊंची उठते देखा और नाव में बेल-पत्ते देखकर मूर्छित हो गिर पड़ा। मूर्छा खुलने पर वह शोक में डूब गया। तब दामाद बोला - 'शोक न मनाएं, यह दंडी का श्राप है। हमें उनकी शरण में जाना चाहिए।'"

"दामाद की बात सुनकर वह दंडी के पास पहुंचा और भक्तिभाव से नमस्कार करके बोला - 'मैंने असत्य वचन कहे, मुझे क्षमा करें।' ऐसा कहकर रोने लगा।"

"तब दंडी भगवान बोले - 'हे वणिक पुत्र! मेरी आज्ञा से तुम्हें दुख प्राप्त हुआ। तू मेरी पूजा से विमुख हुआ।' साधु बोला - 'हे भगवान! आपकी माया से ब्रह्मा भी आपको नहीं जानते तो मैं अज्ञानी कैसे जान सकता हूं? आप प्रसन्न हों, अब मैं सामर्थ्य से आपकी पूजा करूंगा।'"

"साधु के भक्तिपूर्ण वचन सुनकर भगवान प्रसन्न हो गए और वरदान देकर अंतर्धान हो गए। ससुर-जमाई जब नाव पर आए तो नाव धन से भरी थी। वहीं सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपने नगर चल दिए।"

"जब नगर के निकट पहुंचे तो दूत को घर खबर करने भेजा। दूत ने साधु की पत्नी को बताया कि मालिक दामाद सहित आ गए हैं। दूत की बात सुनकर लीलावती ने सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और कलावती से कहा - 'मैं पति के दर्शन को जाती हूं, तू कार्य पूर्ण कर आ जा।'"

"माता के वचन सुनकर कलावती जल्दी में प्रसाद छोड़कर पति के पास चली गई। प्रसाद की अवज्ञा से सत्यनारायण भगवान रुष्ट हो गए और नाव सहित उसके पति को पानी में डुबो दिया। कलावती पति को न पाकर रोती हुई गिर गई।"

"साधु दुखी होकर बोला - 'हे प्रभु! मुझसे और मेरे परिवार से जो भूल हुई, क्षमा करें।' साधु के दीन वचन सुनकर सत्यनारायण भगवान प्रसन्न हुए और आकाशवाणी हुई - 'हे साधु! तेरी कन्या मेरे प्रसाद को छोड़कर आई है इसलिए उसका पति अदृश्य हो गया। यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटती है तो पति मिलेगा।'"

"आकाशवाणी सुनकर कलावती घर पहुंची, प्रसाद खाया और लौटकर अपने पति के दर्शन किए। उसके बाद साधु ने बंधु-बांधवों सहित सत्यनारायण भगवान का विधिपूर्वक पूजन किया। इस लोक का सुख भोगकर वह अंत में स्वर्ग गया।"

**पांचवां अध्याय**

सूतजी बोले - "हे ऋषियों! मैं और भी एक कथा सुनाता हूं। प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भगवान का प्रसाद त्याग कर बहुत दुख भोगा।"

"एक बार वन में जाकर पशुओं को मारकर वह बड़ के पेड़ के नीचे आया। वहां उसने ग्वालों को भक्तिभाव से सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा। अभिमानवश राजा ने उन्हें देखकर भी पूजा स्थान में नहीं गया और न नमस्कार किया।"

"ग्वालों ने राजा को प्रसाद दिया लेकिन उसने वह प्रसाद नहीं खाया और वहीं छोड़कर नगर चला गया। जब नगर में पहुंचा तो सबकुछ तहस-नहस हुआ पाया। वह शीघ्र समझ गया कि यह सब भगवान ने किया है।"

"वह दुबारा ग्वालों के पास पहुंचा और विधिपूर्वक पूजा करके प्रसाद खाया तो सत्यनारायण भगवान की कृपा से सब पहले जैसा हो गया। दीर्घकाल तक सुख भोगकर मरणोपरांत उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई।"

"जो मनुष्य इस व्रत को करेगा उसे भगवान सत्यनारायण की अनुकंपा से धन-धान्य की प्राप्ति होगी। निर्धन धनी हो जाता है और भयमुक्त जीवन जीता है। संतानहीन को संतान मिलती है और मनोरथ पूर्ण होने पर अंत में बैकुंठधाम जाता है।"

**पुनर्जन्म की कथा:**

सूतजी बोले - "जिन्होंने पहले व्रत किया, अब उनके दूसरे जन्म की कथा कहता हूं। वृद्ध शतानंद ब्राह्मण ने सुदामा का जन्म लेकर मोक्ष प्राप्त की। लकड़हारे ने अगले जन्म में निषाद बनकर मोक्ष पाया। उल्कामुख राजा दशरथ होकर बैकुंठ गए। साधु वैश्य ने मोरध्वज बनकर मोक्ष पाया। महाराज तुंगध्वज ने स्वयंभू होकर भक्तियुक्त कर्म कर मोक्ष प्राप्त किया।"

**व्रत का महत्व:**

जो भी श्रद्धा और भक्ति से सत्यनारायण भगवान का व्रत करता है और कथा सुनता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

🙏 बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय 🙏

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📌 PUJA VIDHI (पूजा विधि):

**सत्यनारायण व्रत कैसे करें:**

1. **समय:** पूर्णिमा, एकादशी या किसी भी शुभ दिन

2. **स्थान:** घर में पूजा स्थल या मंदिर

3. **सामग्री:**
   - केला
   - गेहूं का आटा या साठी का आटा
   - शक्कर/गुड़
   - घी
   - दूध
   - दही
   - पान-सुपारी
   - फूल
   - धूप-दीप
   - कलश
   - नारियल

4. **पूजन विधि:**
   - सुबह स्नान करें
   - पूजा स्थल को शुद्ध करें
   - कलश स्थापना करें
   - सत्यनारायण भगवान की मूर्ति या चित्र स्थापित करें
   - संकल्प लें
   - षोडशोपचार पूजन करें
   - गेहूं के आटे, शक्कर, घी, केला से प्रसाद बनाएं
   - भोग लगाएं
   - कथा का पाठ करें या सुनें
   - आरती करें

5. **कथा:** पांचों अध्यायों की कथा पढ़ें या सुनें

6. **प्रसाद:** सभी को प्रसाद वितरित करें (प्रसाद का तिरस्कार न करें)

7. **भोजन:** ब्राह्मणों और परिवार को भोजन कराएं, फिर स्वयं भोजन करें

**व्रत के लाभ:**
- निर्धनता का नाश
- धन-संपत्ति की प्राप्ति
- संतान सुख
- रोग निवारण
- भय से मुक्ति
- मनोकामना पूर्ति
- पापों से मुक्ति
- मोक्ष की प्राप्ति

**ध्यान रखने योग्य:**
- व्रत श्रद्धापूर्वक करें
- प्रसाद का तिरस्कार कभी न करें
- कथा ध्यानपूर्वक सुनें
- ब्राह्मणों का सम्मान करें
- दान-पुण्य करें