शारदा चालीसा - विद्या की देवी

शारदा चालीसा सरस्वती माता की चालीस छंदों में स्तुति है। शारदा सरस्वती का दूसरा नाम है। शारदीय नवरात्रि में विशेष पाठ होता है। कश्मीर में शारदा पीठ प्रसिद्ध है। विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी है। चालीसा से शारदा की कृपा और विद्या की प्राप्ति होती है।

श्री शारदा चालीसा (Shree Sharda Chalisa)

Chalisa Goddesses Chalisa
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परिचय

यह श्री शारदा चालीसा माता शारदा (सर्वेश्वरी, सरस्वती रूप) की महिमा, ज्ञान‑प्रदता और भक्तों पर उनकी कृपा का सुंदर स्तुति‑पाठ है। श्रद्धा और निष्ठा से पाठ करने पर बुद्धि‑विकास, शिक्षा‑लाभ और क्लेशों का नाश होने की परंपरा रही है। नीचे आपका दिया हुआ पाठ साफ‑सुथरे दोहा‑चौपाई (चालीसा) रूप में व्यवस्थित किया गया है।

श्री शारदा चालीसा (Shree Sharda Chalisa)

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॥ दोहा ॥
मूर्ति स्वयंभू शारदा, मैहर आन विराज।
माला, पुस्तक, धारिणी, वीणा कर में साज॥

॥ चौपाई / चालीसा ॥
जय जय जय शारदा महारानी — आदि शक्ति तुम जग कल्याणी।
रूप चतुर्भुज तुम्हरो माता — तीन लोक में तुम विख्याता।

दो सहस्त्र बर्षहि अनुमाना — प्रगट भई शारद जग जाना।
मैहर नगर विश्व विख्याता — जहाँ बैठी शारद जग माता।

त्रिकूट पर्वत शारदा वासा — मैहर नगरी परम प्रकाशा।
शरद इंदु सम बदन तुम्हारो — रूप चतुर्भुज अतिशय प्यारा।

कोटि सूर्य सम तन द्युति पावन — राज हंस तुम्हारो शचि वाहन।
कानन कुण्डल लोल सुहावहि — उरमणि भाल अनूप दिखावहिं।

वीणा पुस्तक अभय धारिणी — जगत्मातु तुम जग विहारिणी।
ब्रह्म सुता अखंड अनूपा — शारद गुण गावत सुरभूपा।

हरिहर करहिं शारदा बन्दन — वरुण कुबेर करहिं अभिनन्दन।
शारद रूप चण्डी अवतारा — चण्ड‑मुण्ड असुरन संहारा।

महिषा सुर वध कीन्हि भवानी — दुर्गा बन शारद कल्याणी।
धरा रूप शारद भई चण्डी — रक्तबीज काटा रण मुण्डी।

तुलसी सूर्य आदि विद्वाना — शारद सुयश सदैव बखाना।
कालिदास भए अति विख्याता — तुम्हारी दया शारदा माता।

वाल्मीकि नारद मुनि देवा — पुनि‑पुनि करहिं शारदा सेवा।
चरण‑शरण देवहु जग माया — सब जग व्यापहिं शारद माया।

अणु‑परमाणु शारदा वासा — परम शक्तिमय परम प्रकाशा।
हे शारद तुम ब्रह्म स्वरूपा — शिव विरंचि पूजहिं नर भूपा।

ब्रह्म शक्ति नहि एकउ भेदा — शारद के गुण गावहिं वेदा।
जय जग बन्दनि विश्व स्वरुपा — निर्गुण‑सगुण शारदहिं रुपा।

सुमिरहु शारद नाम अखंडा — व्यापइ नहिं कलिकाल प्रचण्डा।
सूर्य चन्द्र नभ मण्डल तारे — शारद कृपा चमकते सारे।

उद्धव स्थिति प्रलय कारिणी — बन्दउ शारद जगत तारिणी।
दुःख दरिद्र सब जाहिं नसाई — तुम्हारी कृपा शारदा माई।

परम पुनीति जगत अधारा — मातु शारदा ज्ञान तुम्हारा।
विद्या बुद्धि मिलहिं सुखदानी — जय जय जय शारदा भवानी।

शारदे पूजन जो जन करहीं — निश्चय ते भव सागर तरहीं।
शारद कृपा मिलहिं शुचि ज्ञाना — होई सकल विधि अति कल्याणा।

जग के विषय महा दुःख दाई — भजहुँ शारदा अति सुख पाई।
परम प्रकाश शारदा तोरा — दिव्य किरण देवहुँ मम ओरा।

परमानन्द मगन मन होई — मातु शारदा सुमिरई जोई।
चित्त शांत होवहिं जप ध्याना — भजहुँ शारदा होवहिं ज्ञाना।

रचना रचित शारदा केरी — पाठ करहिं भव छटई फेरी।
सत्‑सत् नमन पढ़ीहे धरिध्याना — शारद मातु करहिं कल्याणा।

शारद महिमा को जग जाना — नेति‑नेति कह वेद बखाना।
सत्‑सत् नमन शारदा तोरा — कृपा दृष्टि कीजै मम ओरा।

जो जन सेवा करहिं तुम्हारी — तिन कहँ कतहुँ नाहि दुःखभारी।
जो यह पाठ करै चालीसा — मातु शारदा देहुँ आशीषा।

॥ दोहा ॥
बन्दउँ शारद चरण रज, भक्ति ज्ञान मोहि देहुँ।
सकल अविद्या दूर कर, सदा बसहु उरगेहुँ॥

जय‑जय माई शारदा, मैहर तेरौ धाम।
शरण मातु मोहिं लीजिए, तोहि भजहुँ निष्काम॥